सबसे पहली बात यह कि संजय चौबे का जो लेखकीय व्यक्तित्व उभर कर आ रहा है, वह एक नवाचारी व्यक्तित्व है. उनकी जो पहली कृति आई थी, कविता-पुस्तक ‘अवसान निकट है’ उसमें भी नवाचार है. वस्तु के स्तर पर प्रायः तो कविता की वस्तु हमेशा नई बनी रहती है, या यह कहें कि मानवीय मन तो हमेशा सक्रिय रहता ही है, कविता की जड़ें जिसमें होती हैं. महत्वपूर्ण यह है कि उसको किस तरह दर्ज करता है लेखक; उस मानवीय मन का कैसा साक्षात्कार संभव होता है उसकी रचना में; कितनी नवीनता के साथ और किस हद तक संप्रेषित होता है, किस तरह संप्रेषित होता है. इसके लिए संस्कृत के आचार्य ने कहा कि कविता प्रभु-सम्मित अथवा मित्र-सम्मित नहीं होती. प्रभु के आदेश की अवज्ञा की जा सकती है, मित्र की सलाह की उपेक्षा की जा सकती है; लेकिन कविता कांता-सम्मित होती है जिसको कि हृदय अनायास स्वीकार करता है. ‘अवसान निकट है’ में एक नया शैल्पिक रूप उभर कर आया है. एक पृष्ठ पर तीन-चार पंक्तियाँ जैसे कि भूमिका हों उस कविता की गद्य में; उसके बाद अगले पृष्ठ पर उसी के समानान्तर उससे जुड़ी हुई कविता है जिससे एक नया शैल्पिक प्रस्ताव बनता है.
‘अवसान निकट है’ के बाद संजय चौबे की किताब आई, ‘9 नवंबर’. यह एक नई किताब है. तारीख़ी तौर पर नई रचना वास्तविक अर्थों में नई नहीं होती. हर अगली रचना नई नहीं होती. नई रचना भीतर से भी नवीनता लिये हुए हो, अपनी संरचना के स्तर पर, पाठक का मन एक नए ढंग से आंदोलित हो, उसको ग्रहण करने की उत्सुकता उसके भीतर उद्दीप्त हो, तब कोई रचना नई होती है.

‘9 नवंबर’ को कुछ लोग नॉवेला कह सकते हैं क्योंकि वह इसकी कायिक शक्ल है; लेकिन यह कहने की ज़रूरत है कि अंग्रेजी साहित्य में नॉवेला एक अलग विधा है. हिंदी में ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं होता. लघु उपन्यास, हिंदी में सच पूछिए तो यह शब्द नॉवेला के लिए नहीं चलता है; जैसे कि अंग्रेजी में जिसे हम शॉर्ट स्टोरी कहते हैं, हिंदी में उसका हम लघुकथा अनुवाद नहीं कर सकते क्योंकि हम जानते हैं कि लघुकथा एक अलग विधा है तथा ‘छोटी कहानी’ कहने का भी कोई मतलब नहीं होता है. इसलिए शॉर्ट स्टोरी का हिंदी अनुवाद केवल कहानी ही होता है. हिंदी में उसे लघु कथा या छोटी कहानी नहीं कहा जाता. उसी तरह नॉवेला या कि उसके बाद एक और नया पद आ गया है, ‘नॉवेलेट’ जो उससे भी छोटा होता है. इन सबके लिए भी हिंदी में उपन्यास शब्द ही चलता है. वैश्विक स्तर पर अनेकानेक पुरस्कार, विशेषकर उपन्यासों के लिए या कथा साहित्य के लिए हैं. उनमें जो किताबें शामिल की जाती हैं और विचारणीय मानी जाती हैं, उनकी कोटियाँ बनी हुई हैं. एक तरह से विवशता है कि कोटि बनानी पड़ती है. नॉवेला की कोटि जो मानी गई है उसमें साढ़े सत्रह हजार या कि बीस हजार से चालीस हजार शब्दों तक की सीमा मानी गई है अर्थात बीस हजार से लेकर चालीस हजार शब्दों के बीच की कथा रचना अथवा औपन्यासिक रचना नॉवेला के अंतर्गत मानी जाती है.
उस तरीके से भी देखें तो ‘9 नवंबर’ निर्धारित सीमा से कहीं अधिक शब्दों की रचना है तो इस तरह यह अतिक्रमित करती है नॉवेला की सीमा को और नॉवेल की सीमा में दाखिल हो जाती है. हालाँकि शब्दों की गिनती करके किसी विधा में किसी कृति को प्रवेश नहीं दिया जाता है. दरअसल लघु उपन्यास या कि नॉवेला एक युगीन विधा है. हमारे समय में आज ज़्यादा प्रासंगिक हो गई है. वैसे इसकी महत्ता पहले भी कम न थी; आज तो ठीक है कि समय का दबाव है, लोगों के पास. आँखें गड़ी हुई हैं लगातार, बझी हुई हैं टेलीविज़न की स्क्रीन से, मोबाइल की स्क्रीन से. फ़ुरसत कम है और फिर सूचनाओं का भी इतना आदान हो रहा है कि उसमें भी व्यस्तता बराबर बनी रहती है. लोगों के पास बहुत प्रदीर्घ रचना को पढ़ने का अवकाश कम से कम होता गया है. ऐसे में वैचारिक संप्रेषण के लिए छोटी रचना उचित है; लेकिन इसके पहले भी जबकि लोगों के पास फ़ुरसत ज़्यादा थी और जनता के लिए अपने मनोरंजन के लिए भी उपन्यास के पास ही जाने की विवशता थी तब भी विश्व के महान रचनाकारों ने छोटे उपन्यास लिखे, नवाचार के स्तर पर. आप टॉलस्टॉय जैसे लेखक को देखें, जिन्होंने बहुत विशाल कृतियाँ रचीं. ‘अन्ना कारेनिना’ जैसा महाउपन्यास या ‘युद्ध और शांति’ जैसा विशाल उपन्यास लिखने वाले टॉलस्टॉय ने ढेरों नॉवेला लिखे. उसी तरह से प्रदीर्घ उपन्यास लिखने वाले लेखकों में दास्तोवेस्की बहुत मशहूर है, सिद्ध-प्रसिद्ध हैं लेकिन उन्होंने भी ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ और ‘द डबल’ जैसे छोटे उपन्यास लिखे जो सच पूछिए तो अद्भुत नवाचारी उपन्यास हैं. अभी तो बहुत ज़्यादा चर्चा है, विशेषकर मार्ख़ेस के बाद से पूरे विश्व-साहित्य में जादुई यथार्थवाद की और जिसको कि अभी हिंदी में भी बहुत उत्साह से हमारे लेखकों ने अपनाया है और नई-नई कृतियाँ संभव हुई हैं. उदय प्रकाश जैसे लेखकों ने इस दिशा में अच्छा काम किया है. जादुई यथार्थवाद के पूर्वज माने जाने वाले लेखक यानी कि मार्ख़ेस से पहले के लेखक अर्जेंटीना के होर्हे लुइस बोर्हेस जैसे लेखक या उसके भी पहले फ्रेंज काफ्का जैसे लेखक या कि निकोलाई गोगोल जैसे लेखक जिनका कि ‘ओवरकोट’ एक नई किस्म की कृति था. वह भी एक तरह से छोटा उपन्यास ही माना जाता है; हालाँकि उसे लंबी कहानी ही कहें हम क्योंकि कहानी के रूप में वह प्रकाशित होता रहा है, लेकिन वह इस परिधि में भी आता है. इन लेखकों ने भी अपेक्षाकृत छोटी रचनाओं में कथा-लेखन की नई ज़मीन तोड़ी है, बोर्हेस ने तो केवल कहानियाँ ही लिखीं. हमारे यहाँ भी शिवमूर्ति की ‘तिरिया चरित्तर’ और ‘आख़िरी छलांग’ जैसी रचनाएँ नॉवेला के अंतर्गत आने वाली रचनाएँ हैं. रणेन्द्र की ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ और हरे प्रकाश उपाध्याय की ‘बखेड़ापुर’ इसी कोटि की रचनाएँ हैं. हालाँकि इनके पहले मुक्तिबोध के ‘विपात्र’ का नाम लिया जाना चाहिए. लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि लंबी कहानी और उपन्यास के बीच फ़र्क़ है. कहानी छोटी हो या लंबी, उसमें एक कथा-वस्तु होती है जो आद्यंत चलती है जबकि उपन्यास में मुख्य कथा-धारा के साथ समानान्तर तौर पर दूसरी, या कहें एकाधिक, कथा-धारा भी चलती होती है और इन धाराओं का पारस्परिक जुड़ाव अपारंपरिक रूपों में भी संभव होता है. इससे, आयतन की संक्षिप्तता के बावजूद, युगबोध का एक बड़ा वर्ण-पट तैयार होता है. ‘9 नवंबर’ में शेखर-अलका के समानांतर बाबा निर्भय दास और गृह मंत्री तथा उनकी पत्नी व बेटी की उपकथाएँ चलती हैं.
अब संजय चौबे के इस उपन्यास की कुछ बातों को देखते हैं. सबसे पहले इसका देश-काल. काल 1 फरवरी 1986 से शुरू होता है जबकि उपन्यास का नायक, शेखर अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर घर लौटता है. बाईस वर्ष का वह है. 1 फरवरी 1986 को ही फैजाबाद जिला जज के आदेश पर विवादित बाबरी मस्जिद के दो गेट खोले जाते हैं, पूजा-अर्चना के लिए. उपन्यास में इस तिथि से 9 नवंबर 1989 तक का काल दर्ज है. 9 नवंबर 1989 को राम जन्मभूमि पर मंदिर का शिलान्यास होता है. यह इसका काल है और देश इसका ? केंद्र-बिंदु के रूप में तो भागलपुर का जनपद है, फिर वह अविभाजित बिहार एवं उसकी दक्षिणी सरहद देवघर और रांची तक जाता है. जैसा मैंने कहा केंद्र-बिंदु भागलपुर है, यह इसका देशकाल है; लेकिन इस देश-काल को अतिक्रमित करती हुई रचना पूरे भारत की है.
सच पूछिए तो जिस समय का यह दौर है 1986 से 1989 तक का, जिसमें कि बाबरी मस्जिद के ताले खोले गए थे और एक वातावरण बन रहा था या कि बनाया जा रहा था जिसमें कि शाकाहारी खंजर, कैफ़ी आज़मी का पद है, खुल रहे थे लोगों के मनों के भीतर. 1989 में राम जन्मभूमि शिलान्यास की घटना जो घटती है, इस किताब की बाहरी सरहद है या जो उच्च बिंदु है इस कथा के उत्कर्ष का जो कि वस्तुतः हमारे सामाजिक अपकर्ष का भी एक निम्न बिंदु है. जब बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ, 6 दिसंबर 1992 को, तो इस घटना ने पूरे देश को बुरी तरह प्रभावित किया; लोगों के मानस को भी प्रभावित किया और हमारे सामाजिक सौमनस्य को भी. उससे देश अब तक उबर नहीं सका है, यह भारतीय यथार्थ है. ऐसे में बाबरी मस्जिद के ध्वंस को लेकर जो कथा-कृतियाँ हिंदी में आईं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण कृति ‘आख़िरी कलाम’ है, दूधनाथ सिंह का उपन्यास. एक और कथा-रचना है जिसकी पर्याप्त नोटिस ली नहीं गई हिंदी आलोचना के द्वारा; वह है आबिद सुरती का ‘कथावाचक’. इनके अलावा कोई तीसरी महत्वपूर्ण कृति मेरी निगाहों से नहीं गुजरी और मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं कथा-रचनाओं का थोड़ा आलसी पाठक हूँ. इसलिए मैं यह दावा नहीं कर सकता कि सारी रचनाएँ, कथा-रचनाएँ विशेषकर, मैंने देखी हैं; लेकिन 1989 में भागलपुर में जो दंगा छिड़ा और भागलपुर के पूरे जनपद में फैला, अगल-बगल के गाँव-देहात जिसकी लपेट में, चपेट में आए. भीषण हिंसा हुई. बहुतेरे लोगों को बग़ैर कफ़न के दफ़न कर दिया गया, ज़मींदोज़ किया गया. लाशों का पता न लग सके, इसलिए जल्दी-जल्दी उनमें सब्जी बो दी गई; गोभी के फूल खिले लाशों के ऊपर. ये सारी घटनाएँ मीडिया के द्वारा भी, दबे स्वर में सही लेकिन बताई गई थीं, कही गई थीं. लोग जानते थे. यह अविदित नहीं था, भारतीय जनता के लिए; लेकिन लेखकों ने इस ओर अपनी दीठ नहीं उठाई, हिंदी के प्रसिद्ध लेखकों ने; तो एक नए लेखक को यह दायित्व निभाना ज़रूरी लगा. संजय चौबे उस जनपद के हैं, उस ज़मीन की मिट्टी का क़र्ज़ है इनके ऊपर; वे महसूस करते हैं ऐसा. उन्होंने सच कहने का साहस दिखाया. लेकिन कोई भी औपन्यासिक या साहित्यिक रचना केवल साहस से बड़ी नहीं बनती, महत्वपूर्ण नहीं बनती. साहस दुर्लभ है लेकिन वह लेखन के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है. लेखन के लिए एक विशिष्ट जीवन-दृष्टि चाहिए. एक लेखकीय आँख होनी चाहिए लेखक के पास, तीसरी आँख. अच्छी बात है कि ‘9 नवंबर’ में उस तीसरी आँख के होने के या कम से कम उसके उन्मीलित होने के संकेत मिलते हैं.
इसी सिलसिले में आगे यह कि ‘9 नवंबर’ के काल-देश का एपिसेंटर, पूरे भूचाल का केंद्र-बिंदु भले ही अयोध्या रहा हो, उस भूचाल की जो तरंगें थीं वे पूरे देश, विशेषकर पूरे हिंदी क्षेत्र में बहुत शिद्दत से महसूस की जा रही थीं. बनारस में तरंगों का आवेग और भी ज़्यादा महसूस हो रहा था क्योंकि उसका दूसरा उपकेंद्र बनारस ही था; लेकिन वे तरंगें पूरे हिंदी क्षेत्र में फैली हुई थीं. हिंदी क्षेत्र में ही क्यों, वे मध्य भारत के अहिन्दीभाषी क्षेत्रों तक फैली हुई थीं. कार सेवक के रूप में आने वाले लोगों में महाराष्ट्र के लोगों की, गुजरात के लोगों की संख्या कम न थी. महाराष्ट्र के लोग बड़ी संख्या में थे. याद करें कि डॉ. राम विलास शर्मा ने हिंदी जाति की बात कही थी. यह हिंदी जाति हिंदू और मुसलमान के बीच के सामाजिक विभाजन को स्वीकार नहीं करती. लिपि-भेद के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों में फाँक डालने का जो काम फोर्ट विलियम कॉलेज के द्वारा किया गया, उसे हिंदी जाति को विभाजित करने वाले औपनिवेशिक षडयंत्र के रूप में समझा जा सकता है. भारत के नागर से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में समाचार-विचार-विनिमय के लिए हिंदी का ही प्रयोग होता है, हिंदुओं और मुसलमानों के द्वारा समान रूप से. ग्रामीण क्षेत्रों में तो लिपि-भेद की कोई बात ही नहीं उठती क्योंकि पूरा भाषिक कार्य-व्यापार वाचिक स्तर पर संपन्न होता है. उर्दू हिंदुस्तान की ज़मीन पर ही उपजी और वह हिंदी से अभिन्न है. हिंदी जाति की इसी बुनियादी एकता ने 1857 के ग़दर में, जिसे कार्ल मार्क्स ने पहला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहा था, बड़ी भूमिका निभाई. अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को आगे कर के हिंदू राजे-रजवाड़े और सिपाही युवक जो किसान परिवारों से आते थे, ईस्ट इंडिया कंपनी के औपनिवेशिक शोषण और शासन के विरुद्ध लामबंद हुए. ध्यान दें तो हिंदी क्षेत्र का विस्तार मध्य भारत के महाराष्ट्र और गुजरात तक देखा जा सकता है. भारत-विभाजन ने हिंदू मुसलमान के बीच की दरार को खाई में बदल दिया और बाद के दिनों में ज़ख़्मों के भरने पर भी इस त्रासदी की स्मृति लुप्त नहीं हुई और सत्ताकांक्षी सांप्रदायिक ताक़तों ने इस घाव को कभी पूरने भी नहीं दिया. इस घाव पर एक और बड़ा घाव करने वाली घटना साबित हुआ, बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना. इसी की पृष्ठभूमि वाले कोलाहल-कलह भरे दिनों की दास्तान है, ‘9 नवंबर’. ‘9 नवंबर’ के लेखक की दृष्टि धार्मिक भिन्नता और जीवनशैलियों के अंतर के बावजूद हिंदी जाति के दो बड़े घटकों, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की उस डोर पर टिकी है जो भले झटके पर झटके खा रही है, इसे तोड़ने की कोशिशें लगातार जारी हैं लेकिन जो अभी टूटी नहीं है और जिसने अभी भी भारतीय समाज को विखरने से बचा रखा है.
इस तरह यह एक विज़न का उपन्यास है; लेखकीय दृष्टि—जीवन दृष्टि से संपन्न उपन्यास है. इसके साथ-साथ यह भी सच है कि आख़िर तक पहुँचते हुए इस विज़न की परिणति एक तरह के ट्रैजिक विज़न में हुई है और त्रासदी का जो प्रभाव पड़ता है मन पर, वह बहुत गहरा होता है. यह भी देखने योग्य है कि संजय चौबे का यह उपन्यास जो एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश करता है, ‘नया आदमी’ का प्रस्ताव, वह आम आदमी के नष्ट हुए बग़ैर संभव नहीं है. यथास्थिति की शक्तियों को भारतीय राजनीति, चाहे कोई भी राजनीतिक दल हो, का भरपूर समर्थन मिलता है. उपन्यास यह कहता है कि आम आदमी के नष्ट हुए बग़ैर ‘नया आदमी’ नहीं बन सकता. यह आम आदमी यथास्थितिवादी है; यह बहुत समझौतापरस्त है; यह अंधविश्वासी है; यह रूढ़ियों से ग्रस्त है. यह आम आदमी मिटेगा, तब नया आदमी बनेगा और जो भी राजनीतिक शक्तियाँ हैं इसी आम आदमी को गौरवान्वित करके, प्रलोभित करके अपने पाले में खींचकर, संख्या-बल बढ़ाकर अपना राजनीतिक व्यवसाय चला रही हैं. ‘9 नवंबर’ का जो नायक है, शेखर, वह पागल हो जाता है और वह कहता है, “इस मिट्टी से कान लगाकर सुनो, इसमें लोगों की साँसें सुनाई देंगी, तुम्हें. लोग बंद है इस ज़मीन के नीचे.” गोभी के फूलों को उखाड़ता है और कहता है, “लोग दफ़न हैं, इसके नीचे. वे चिल्ला रहे हैं. वे तेज साँसें ले रहे हैं; एक आर्त्त पुकार है, सुनो.” कोई सुनने को तैयार नहीं है, सब इस को एक पागल की हरकत मानते हैं. इससे बहुत पहले लू शुन, प्रेमचंद के समकालीन विख्यात चीनी लेखक ने भी ऐसा देखा था. उनकी एक अद्भुत कहानी है. लंबी कहानी है, ‘एक पागल की डायरी.’ इसमें जो पागल है, वह महसूस करता है कि लोग मानव-मांस खा रहे हैं; नरभक्षी हो गए हैं. वह यही कहता है, यह उसका शुबहा है कि लोग नरभक्षी हो गए हैं. ध्यान से देखें तो लोग सचमुच खा रहे हैं, मानव-मांस ही खा रहे हैं. ठीक है कि वह बैंक बैलेंस की शक्ल में है लेकिन वह इंसानों के रक्त और मांस का ही ढेर है, वर्चुअल रूप में बदला हुआ. मुक्तिबोध की एक कालजयी रचना है, पचास वर्ष पहले लिखी हुई, ‘अंधेरे में.’ इसमें एक पागल है. उसकी एक उक्ति है उसमें. वह कहता है- ‘मर गया देश अरे, जीवित रह गए तुम.’ ‘9 नवंबर’ का पागल, शेखर भी जैसे कि अपने शब्दों में मुक्तिबोध के इस पागल की पंक्ति, ‘मर गया देश अरे, जीवित रह गए तुम.’ को दुहराता है, ध्वनित करता है. चाहें तो हम याद कर सकते हैं कि विश्व-साहित्य के दार्शनिकमना जोनाथन स्विफ्ट, गोगोल, एडगर ऍलन पो, स्ट्रिंडबर्ग, निराला, राहुल सांकृत्यायन, भुवनेश्वर सरीखे दिशान्वेषी लेखकों और चित्रकला में युगान्तर संभव करने वाले वॉन गॉग जैसे कलाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता की प्रौढ़ावस्था में मानसिक विक्षेप के आघात सहे; यह सत्यान्वेषी होने की सजा है जिसे सुकरात से आजतक देखने-पाने को हम विवश हैं.
एक और मूल्यवान बात है, रेखांकित करने के लायक. उपन्यास का नायक शेखर और उसकी फुफेरी बहन, अलका जो कि वस्तुतः एक संग्राम के, एक अभियान जो वे छेड़ते हैं ‘नया आदमी’ बनाने का, उसके वे सहयात्री हैं, ‘कॉमरेड इन आर्म्स’ हैं. वे क्षणिक आकर्षण के वशीभूत संबंध बनाते हैं, दैहिक संबंध और विवेक की फटकार भी सुनते हैं, इसके कारण. एक आत्म-फटकार, आत्म-भर्त्सना झेलते हैं वे. एक पश्चात्ताप से गुजरते हैं वे लेकिन उसको अपने ऊपर हावी नहीं होने देते. ऐसा सामाजिक वातावरण बना हुआ है अपने देश में कि अगर किसी स्त्री के साथ ऐसा होता है तो बार-बार यह कहा जाता है कि जैसे उसका जीवन मिट गया, अब जैसे कि कोई भविष्य नहीं है; रास्ता बंद है; लेकिन इस उपन्यास के चरित्र अपराध-बोध से मुक्त होते हैं और आगे बढ़ते हैं, नई राह भी तलाशते हैं. इस तरह यह किताब यौन शुचिता की स्थापित मान्यताओं को तोड़ती है.
आगे संजय चौबे की भाषिक विशिष्टता का ज़िक्र आवश्यक है. प्रेमचंद के यहाँ यथार्थवाद अपने शुरुआती दौर के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से आगे बढ़कर यानी वह आदर्शोन्मुख यथार्थवाद, जो कि उनकी शुरुआती रचनाओं में दिखाई देता है—‘पंच परमेश्वर’, ‘ठाकुर का कुआँ’ वगैरह जैसी रचनाओं में, आगे बढ़कर ‘नशा’ और ‘कफन’ तक पहुँचता है. यथार्थवाद का वह आगे का रूप है, निरावरण यथार्थवाद, जिससे आदर्शवाद झड़ चुका है. ‘9 नवंबर’ में युगीन यथार्थ से आदर्शवाद का टकराव चित्रित है जिसमें आदर्शवाद की पराजय उसकी नियति है. यह प्रेमचंद से आगे का समय है, आज का समय. प्रेमचंद बातों को स्पष्ट रूप से कहते चलते हैं. संजय चौबे के यहाँ विज़न की स्पष्टता है, दृष्टि की स्पष्टता तो है लेकिन भाषा में सांकेतिकता है. प्रेमचंद भाषा में सांकेतिकता से काम नहीं लेते, वे अभिधात्मक तरीके से पेश आते हैं. संजय चौबे अपनी भाषा में सांकेतिकता का सहारा लेते हैं और इससे इनकी कथा-भाषा में ख़ास तरह की एक गहराई बनती है, ‘इवोकेटिव डेप्थ’ बनती है. इस तरह हमेशा कथात्मक बने रहते हुए भी और हमेशा यथार्थपरक बने रहते हुए भी संजय चौबे की भाषा में अपनी तरह की एक काव्यात्मकता शामिल रहती है. जैसे अलका के लिए वे कहते हैं कि ‘उसका मस्तिष्क एक ऐसे रेडियो की तरह हो रहा है जो एक साथ कई स्टेशनों को पकड़ रहा है.’ जब गृह मंत्री की पत्नी का वर्णन करने का समय आता है तो उसकी वेश-भूषा पर, बाहरी रूप या कि आंतरिक चरित्र पर कोई टिप्पणी नहीं करते हैं और केवल एक पंक्ति में कहते हैं कि ‘इतना ही कहना काफी होगा कि लोग उन्हें ‘लल्लनटॉप आंटी’ कहते हैं.’ यह विलक्षण है और केवल यह भर कह देने से कि लोग उन्हें ‘लल्लनटॉप आंटी’ कहते हैं, एक तस्वीर खड़ी हो जाती है मस्तिष्क में. यह इवोकेटिव होना है, भाषा के स्तर पर. ऐसे में अगर महान फ्रेंच उपन्यासकार बाल्ज़ाक होते तो कम से कम दस पृष्ठ लिखते. वे ब्यौरों में जाते, किसी चरित्र को प्रस्तुत करने से पहले. संजय चौबे ब्यौरों में नहीं जाते, सांकेतिकता से काम लेते हैं. उपन्यास में किसी की रूपरेखा नहीं उभारी गई है लेकिन आंतरिक व्यक्तित्व उद्घाटित होता है. यह उनकी लेखकीय विशिष्टता है, इस ओर भी हमारा ध्यान जाना चाहिए. और इस तथ्य की ओर भी कि पूरा उपन्यास तेज़रफ़्तार कथानक के कारण पाठक की उत्सुकता को थोड़ा भी शिथिल नहीं होने देता : बेशक यह किसी उपन्यास के लिए अपेक्षित प्राथमिक गुण है लेकिन जो इधर के उपन्यासों में धीरे-धीरे छीजता गया है.
अंत में, मुझे ऐसा लगता है कि संजय चौबे के लेखक ने सर्जना की अपनी विधा पा ली है और वह है कथा-लेखन. उनकी अगली कृति के लिए उत्सुक रहना बनता है.
(जनवरी 2015)