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जिस देश में आप रह रहे हैं उस देश का इतिहास कम से कम चार-पाँच हजार साल पुराना तो है ही. मैं समझता हूँ कि हमारा ऋग्वेद ही दुनिया की सबसे प्राचीनतम पुस्तक है और उसमें जाति की व्यवस्था नहीं है-–यह बहुत साफ़ है; लेकिन आगे चलकर जातिगत व्यवस्था भारत की एक बुनियादी समस्या के रूप में उभरी और बाद में अंग्रेज़ी राज ने भारत को एक नई समस्या दी. 1857 के बाद एक नए किस्म की सांप्रदायिकता पनपी और वह सांप्रदायिकता राजनीति प्रेरित थी. ये जो सांप्रदायिकता है, इसने इस देश को एक बड़ी समस्या से ग्रस्त कर रखा है.
संजय चौबे ने सांप्रदायिकता की इसी समस्या के इर्द–गिर्द अपने उपन्यास ‘9 नवंबर’ को बुना है. उपन्यास में ख़ासतौर से एक ही परिवार में दो पीढ़ियाँ हैं-–एक तरफ़ पिता है तो दूसरी तरफ़ पुत्र. पिता भारतीय समाज की विडंबना को, उसके अंतर्विरोधों को समझता है; लेकिन उस विडंबना से और अंतर्विरोध से समझौता करता है; उसको बदलने की कोशिश नहीं करता है. पुत्र के पाँव के नीचे से पढ़ाई-लिखाई के कारण ज़मीन लगभग खिसक सी गई है, लेकिन उसके सपने और उसकी उमंग, बदलने की कोशिश, परिवर्तन की कोशिश बहुत तेज है. एक ही परिवार में ये दो बातें घटित हो रही हैं. वैसे ही जैसे प्राचीन भारत के आर्य परिवार में बुद्ध और महावीर की कोशिशें थीं. इसलिए ये नई कोशिश नहीं है. उपन्यास के पास कोई नया तरीका नहीं है, लेकिन एक तरीका है कि वह एक प्रकार से नए आदमी की परिकल्पना करता है ताकि भारतीय समाज को पुराने दिमागों से मुक्त किया जाय. आखिर नए आदमी और पुराने आदमी से मतलब क्या है ? पुराने आदमी का मतलब ये है कि पुराने दिमाग वाले लोग, जिनका दिमाग सदियों पुराना है और जो ऐसा समझते हैं कि ये तो ऐसा ही चलता रहा है और ख़ास तौर से आप प्रायः सुनते होंगे कि एक सनातन शब्द चलता है और उसको धर्म से भी जोड़ दिया जाता है जबकि सनातन का मतलब है ‘ऑल्वेज़ कंटिन्युअस’. जो निरंतर है वह सनातन है. इस तरह सनातन तो हमारी परंपरा है और उस परंपरा में ढेर सारी बातें हैं. इसलिए ये जो एक ख़ास प्रकार से धर्म के साथ सनातन जोड़ा जाता है वह एक बहुत बड़ी बदमाशी है क्योंकि धर्म कभी सनातन रहा ही नहीं. आप ये देख लें कि वैदिक धर्म अलग है, जैन धर्म अलग है, बौद्ध धर्म अलग है और वैष्णव आंदोलन में जो धर्म का स्वरूप आया वह बिल्कुल भिन्न है. इसलिए सनातनता क्या चीज़ है. इस सनातनता के पीछे एक बदमाशी है. तो मेरा मानना है कि एक दिमाग तो भारत में हमेशा रहा जो निरंतर यह कोशिश करता रहा कि समाज जैसा पहले से चलता आ रहा है वैसा ही रहे. दूसरा एक दिमाग ऐसा रहा जो देखता रहा कि पहले से जो चलता आ रहा है उसमें बदमाशियाँ कितनी आ गयी हैं, उन बदमाशियों को दूर कैसे किया जा सकता है और उसने हमेशा परिवर्तन की कोशिशें कीं. उपन्यास में इन्हीं दो तरह के दिमागों की ओर इशारा किया गया है.
दूसरी बात, भारत की जो 1947 के बाद की राजनीति है वह अब राष्ट्रीय राजनीति नहीं है. अब किसी को भारत की चिंता नहीं है. हर आदमी को चिंता है कि ‘बाइ हुक ऑर क्रूक’ दिल्ली की गद्दी पर क़ब्ज़ा करना है. ऐसे में उनकी इच्छा जो है वह समाज को एक करने की नहीं है, इस बात को आप समझ लें. इसलिए अगर आप एक बड़े समाज में, संसार में रहना चाहते हैं तो इनके चेहरों को भी पहचान लें और संजय चौबे के उपन्यास में इन चेहरों को हल्के से दिखाने की कोशिश की गयी है. हालाँकि ज़्यादातर तो आमने-सामने हिन्दू-मुसलमान हैं, लेकिन जो लोग राजनीति में हैं उनका चेहरा तो आप आसानी से पहचान ही सकते हैं. बड़ी उम्मीद से आप बार-बार राजनीति की तरफ़ जाते हैं. उसे तवे में चढ़ी हुई रोटी की तरह पलटते हैं, उलटते-पुलटते हैं लेकिन हश्र क्या होता है. कुल मिलाकर बनता क्या है ? तो मेरा कहना है कि ‘पावर मौंगर्स पोलीटिक्स’ ही हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद की पॉलीटिक्स है. अब इस पॉलीटिक्स को कितने लोग बदल पायेंगे, कितने लोग इसमें सेंध लगाकर संशोधन कर पायेंगे, परिवर्तन कर पायेंगे—ये सब अहम समस्याएँ हैं. उपन्यास में ख़ास तौर से कुछ इन्हीं बातों की तरफ़ इशारा किया गया है और वह इशारा ठीक भी है.
साथी साहित्यकार ‘9 नवंबर’ के साथ दो उपन्यासों का ज़िक्र करते हैं-–एक भीष्म साहनी का ‘तमस’ और दूसरा दूधनाथ सिंह का ‘आख़िरी कलाम’. मैं एक और उपन्यास का ज़िक्र करना चाहता हूँ, जो हिन्दी का नहीं बांग्ला का है और जिसके कारण तसलीमा नसरीन को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा. उस उपन्यास का नाम है-–‘लज्जा’. जब मैं इस ‘9 नवम्बर’ को पढ़ रहा था तो बार-बार मुझे ‘लज्जा’ की याद आ रही थी, ख़ास तौर पर इसकी शैली को लेकर. वह भी कुछ इसी तरह की वेदना और चेतना से लिखा गया उपन्यास है व प्रायः आकार-प्रकार में भी बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है, लगभग आस-पास के पृष्ठों के दोनों उपन्यास हैं. दोनों आकार में विशालकाय नहीं हैं और यह ठीक भी है क्योंकि आजकल आपको प्रायः किताब पढ़ने से ज़्यादा एस एम एस और फेसबुक पर जो आता है उनको पढ़ने में ज़्यादा सुविधा रहती है. प्रायः आप चाहते हैं कि चीज़ें बहुत थोड़े में और भाषा के संक्षिप्तीकरण के साथ आपको मिल जाय. इसलिए मुझे लगता है कि ये शिल्प बुरा नहीं है जहाँ आप ‘हिंट’ करते हुए छोटी-छोटी घटनाओं का कोलाज इकट्ठा करते हुए चलते हैं.
यह ध्यान देने योग्य है कि मानवता का बँटवारा सबसे दुखद बँटवारा होगा क्योंकि जब मानवता का बँटवारा होने लगता है तो फिर बचता क्या है. फिर तो हम किसी दिन अपने परिवार के लोगों पर ही संदेह करने लगेंगे. इस स्थिति में मैं समझता हूँ कि संजय चौबे का उपन्यास इस दर्द से लिखा गया है कि ये सब कम हो, बदले; और हम एक नए समाज में जायें. बहुत पहले सुमित्रानंदन पंत ने एक काव्य लिखा था--‘लोकायतन’. उसमें भी एक नए मनुष्य की परिकल्पना की गयी थी. इसका मतलब कि बार-बार ये कल्पना की जाती है और बार-बार इस कल्पना को साकार देखने की इच्छा होती है; लेकिन यह कल्पना कभी पूरी होती है, कभी अधूरी रह जाती है. तो मैं समझता हूँ कि जो स्वर्गिक कल्पना--यूटोपिया इस उपन्यास में की गयी है वह बहुत ही अनुकूल है, समय के अनुकूल है और वह हमारी चेतना को नए सिरे से कुरेदती है कि क्या हम नए सिरे से सोच सकते हैं.
आप जिस शहर में रह रहे हैं, उस सामाजिक वातावरण में रहते हुए कभी न कभी ये चीज़ें परेशान अवश्य करती होंगी. ख़ासतौर पर आज जब युवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है, तब उनके जीवन जीने के तरीके में बहुत सारी चीज़ें जो पुरानी हैं, बाधाओं के रूप में आकर खड़ी होती हैं. वे बाधाएँ इस उपन्यास के नायक शेखर के सामने भी हैं. एक बात जो गाँधी के अनुयायी बाबा निर्भय दास के माध्यम से बार-बार कहलायी गयी है कि परिवर्तन इतनी तेजी से नहीं होता है. एक बार इतिहास और प्राचीन भारतीय संस्कृति के एक बहुत बड़े विद्वान आचार्य राजबली पांडेय ने कहा था कि ‘अपना जो देश है न, वह कंगारू की तरह है’. पहले तो हमलोगों ने समझा नहीं कि वे किस तरह इस देश को कंगारू से जोड़ रहे हैं तो उन्होंने कहा कि असल में आपने देखा होगा कि कंगारू का पिछला हिस्सा बहुत भारी होता है और अगला हिस्सा उसकी तुलना में काफी हल्का. इस देश का जो अतीत है, वह बहुत भारी है. इसलिए उस अतीत, ख़ास तौर पर जो तात्कालिक अतीत है, से लड़ना कोई छोटा काम नहीं. एक बात और, यहाँ का लोक, भारत का विराट अवचेतन, सामूहिक अवचेतन अलग तरह से सोचता है. उसे बाँटकर सोचना अच्छा नहीं लगता. वह हमेशा से लोगों को पहचानने और आत्मसात करने में, मिलने-जुलने में भरोसा रखता है; लेकिन आज जिस तरह की कोशिशें चल रही हैं, वह बहुत बड़ा ख़तरा है. आपको इन सब बातों से लड़ना है और यह उपन्यास प्रोजेक्ट करने की कोशिश करता है कि इनसे लड़ने का वक्त आ गया है क्योंकि अगर एक शेखर (9 नवंबर का नायक) अपनी कुछ जल्दबाजी के कारण असफल भी होता है तो समाज में हजार शेखर पैदा हो सकते हैं. और इस रूप में जो नौजवान शेखर हैं या संभावित नौजवान शेखर हैं उनके लिए यह उपन्यास एक चैलेंज रखता है कि क्या आपमें से कुछ लोग इसके आगे का रास्ता तय कर सकते हैं.
यथार्थ के बहुत क़रीब रहकर, यथार्थ की जो विकृतियाँ हैं उसको देखने की कोशिश इस उपन्यास में की गयी है. मैं समझता हूँ कि उपन्यासकार की ये कोशिश बहुत भली, नेकनीयत से की गयी कोशिश है. इस तरह की चीज़ें लिखकर के आपको थोड़ा-थोड़ा प्रबोधित किया जा रहा है. एक फिल्मी गीत का टुकड़ा था कि अब ये देश तुम्हारे हवाले है. तो सवाल उपन्यास से बाहर निकल कर के अपने-अपने हिस्से के हवालों को देखने का भी है कि आप अपना-अपना हिस्सा कैसे पूरा कर पाते हैं. अगर उस दिशा में आपने सोचना शुरू किया और एक नया समाज बनाने की कोशिश की तो इस लेखन की सार्थकता समाज में घटित होगी.
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