‘9 नवंबर’ : सनातनी भारत के प्रेतों से लड़ता उपन्यास

वरिष्ठ साहित्यकार हरी चरन प्रकाश की समीक्षा...

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          किसी भी समाज की इतिहास–चेतना के कुछ पारिभाषिक क्षण होते हैं जो व्यक्ति की भावी सामाजिक चेतना की निर्मिति का प्रयास तो करते ही हैं, कथाओं और उपकथाओं के माध्यम से उसके वर्तमान और भूत की भी पुनर्व्याख्या करने के लिए प्रस्तुत होते रहते हैं. तिथियाँ इस चेतना की निशानदेही भर करती हैं. संजय चौबे के उपन्यास, ‘9 नवंबर’, में 9 नवंबर 1989 की तिथि उपन्यास के मानस का नाभिकीय केंद्र है. उन्होंने इस तिथि को दो सन्दर्भों में प्रयुक्त किया है : 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरी थी और इसी दिन सनातन भारत में राम जन्मभूमि पर शिलान्यास हुआ था. गौरतलब है कि बर्लिन की दीवार का गिरना ग्लोबलाइजेशन के इस समय का एक पारिभाषिक क्षण है. तिथियों का यह संयोग आकस्मिक तो है किन्तु इतिहास की द्वंदात्मकता के दृष्टिगत अर्थहीन नहीं है. बीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में एक तरफ़ वैश्वीकरण के जगरनाट की अप्रतिहत गति और दूसरी तरफ़ अनेक प्रतिगामी धार्मिक, जातीय और उपराष्ट्रीय अस्मिताओं के उभार के इस विडंबनात्मक संयोग की अकादमिक समझ अभी पड़ताल के दौर से गुजर रही है, इसलिए इस बीच रचा गया साहित्य अगर मशाल की तरह नहीं तो जुगनू की तरह रोशनी की पहल करता रहेगा. संजय चौबे के उपन्यास को इस नज़रिये से देखने की ज़रूरत है क्योंकि ‘सनातन भारत’ की संज्ञा का प्रयोग करके वह इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि सनातनी भारत असली भारत के सर पर भूत की तरह सवारी करने का अभ्यास करता रहता है. प्रस्तुत उपन्यास इन्हीं प्रेतों के विरुद्ध एक सक्रिय हस्तक्षेप है.

          उपन्यास में ‘शेखर’ जैसे प्रोएक्टिव नायक और ‘निश्चय’ जैसी असर और रसूख़ की मिल्कियत से बनी नायकत्व की क्लासिकल अवधारणा स्वभावतया कहीं–कहीं रूमानियत से ग्रस्त हो जाती है और वहीं यह लगता है कि उपन्यास का वैचारिक पक्ष अक्सर भलमनसाहत और इंसानियत की सहज निष्ठाओं पर आधारित है. शायद उपन्यास में ‘नया आदमी’ और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि तथा कर्मशीलता के द्वारा एक प्रतिरोधी विकल्प के सृजन के माध्यम से इस कमी को बहुत कुछ संबोधित करने का प्रयास किया गया है. 

          ‘निश्चय’ और ‘बड़े मालिक’ की संयुति में नेहरूवियन छाया और आभा दोनों हैं. जो अनेहरूवियन है, वह है किंगमेकर होने की धूमिल होती हुई गर्वदीप्ति. यूँ काफी अरसे से हिन्दी आलोचना में ‘नेहरू युग से मोहभंग’ का पद प्रचलित रहा है, परन्तु अच्छा होता कि इस बात की भी पड़ताल की जाती कि उक्त मोहभंग से समाज की प्रगतिशील और प्रतिगामी शक्तियों को क्या फायदा–नुकसान हुआ और उसके साहित्यिक संदर्भ क्या हैं. ‘9 नवंबर’ में इस प्रश्न को रूपक के माध्यम से छूने की कोशिश की गई है. 

          उपन्यासकार की अनुवीक्षणात्मक अभिव्यक्तियाँ प्रभावशाली हैं. उदाहरणार्थ फोटोग्राफ पर यह अभिव्यक्ति ‘दुनिया के समझदार इंसान कितने विचारमग्न हैं’ या वह ‘साइकिल जिसकी पैडल नाक की तरह खुलती और बंद होती है’.

          संजय चौबे ने इस बात की समझदारी बरती है कि जहाँ भयानक तथ्य, भयोत्पादक कल्पना पर भारी पड़ते हों वहाँ कल्पनाप्रसूत रचनात्मकता को विराम दिया जाए. भागलपुर दंगों के शिकार मुसलमानों की मिट्टी में दफ़न लाशों पर गोभी की खेती एक ऐसा ही तथ्यात्मक उल्लेख है जिसे किसी रचनात्मक विस्तार की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने यह समझदारी भी बरती है कि साम्प्रदायिकता का विरोध एकतरफा न हो. जहाँ वह हिन्दू साम्प्रदायिकता का खुलकर विरोध करते हैं वहीं मुस्लिम साम्प्रदायिकता के खतरों को नजरअंदाज नहीं करते हैं.

          उपकथाएं जैसे ‘छोटे पंडित’ की सर्वथा लौकिक और नैतिक आसक्तियों के साथ महात्मा गांधी के आंदोलन का गठजोड़ और अंतरधार्मिक, अंतरजातीय विवाह के तेरह जोड़े और बाद में उनमें से चार की जान खतरे में पड़ जाना अथवा जिन्दगी की कटी–फटी सड़ांध, जैसे छोटी आयु में ही अलका का एक कुत्सित स्पर्श का शिकार होना और उसके बरक्स ‘लल्लन टॉप आंटी’ की रतियाचना आदि कुछ ऐसी रचनात्मक घटनाएं हैं जिनसे लगता है कि संजय चौबे व्यष्टि और समष्टि को अलग–अलग और साथ–साथ दोनों तरह से संबोधित करना चाहते हैं. दु:स्वप्न नींद की छाती फाड़ कर प्रकट होते हैं और स्वतः सृजनशील भाषा में ढल जाते हैं. मुक्तिबोध की कविता है ‘जब प्रश्नचिह्न बौखला उठे’ जहाँ--

“यद्यपि दिन है

सब ओर आग लगाते हुए विद्युत् क्षण हैं 

किन्तु अँधेरे में--

अपनी उठती–गिरती लौ की लीलाओं में 

अपनी छायाओं की लीला देखता रहा”

          उपन्यास पढ़ते समय मन में यह कविता कौंध उठती है.

          चूँकि उपन्यास का आख्यान एकरेखीय नहीं है, इसलिए उसकी घटनाएं और भावनाएं अपनी ही डायनामिक्स से उच्छ्वास की तरह सतह पर उतराती और तल में समाती हैं. यद्यपि यहाँ यह कहना आवश्यक है कि चूँकि यह उपन्यास स्मृतिमंथन की रचना है इसलिए ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं है परन्तु इस कारण उपन्यास में बिखराव आते हैं. अनेक ऐसे पात्र हैं जिनकी उपस्थिति वातावरण का सृजन तो करती है परन्तु कथा के गठन को कमजोर करती है. इसके बावजूद और इस कारण भी यह उपन्यास एक परवर्ती कथा की आशा जगाता है.    

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