सबसे बड़ी चीज कि समकालीन युवा समाज के बारे में और आज की बहुत सारी रचनात्मकता के बारे में ये शिकायत की जाती है कि उसमें अपने समय के मनुष्यता का जो दर्द है, उसके जो बुनियादी संकट हैं, उसके जो प्राथमिक संताप हैं, उसके जो संघर्ष हैं--इनकी अनदेखी की जा रही है. ऐसे में मुझे अच्छा लगा कि ‘9 नवंबर’ में ठीक इसका उलट है. इसमें समकालीन समय की, आज के समय की जो सबसे बड़ी चुनौती है—धर्मांधता, जातिवाद व कट्टरता की; उससे मुठभेड़ करने की, उससे आँखें चार करने की, आँखें लड़ाने की कोशिश पूरी ताकत के साथ की गई है. यह मुठभेड़ न केवल ताकत के साथ की गई है बल्कि इस प्रक्रिया में एक बेहतर भविष्य का सपना भी बुना गया है. मोटे तौर पर कहूँ तो जैसे-जैसे हम सयाने होते चले जा रहे हैं, हमारी आँखों से एक भविष्य का, एक बेहतर इंसानियत का यूटोपिया खत्म होता जा रहा है; लेकिन ‘9 नवंबर’ एक यूटोपिया का उपन्यास है. इसमें लेखक ने एक यूटोपिया देखा है, एक ‘नया आदमी’ का कॉन्सेप्ट, एक ‘नया आदमी’ का यूटोपिया देखा गया है. चूँकि यह उपन्यास जीवन का उपन्यास है और जीवन के तर्कों से ही चलता है, ‘9 नवंबर’ एक यूटोपिया के निर्माण से लेकर उस यूटोपिया के विध्वंस की गाथा है. इसका नायक, शेखर एक यूटोपिया देखता है. ‘नया आदमी’ का एक आंदोलन चलता है. फिर आदर्श की राह में यथार्थ का जो कटुतापूर्ण, काँटों भरा गलीचा है; जब वह चुभता है तो सब बिखर जाता है. इस तरह एक यूटोपिया के निर्माण और उसके विध्वंस की कथा इस उपन्यास में कहीं गई है.
उपन्यास में ‘निश्चय’ नामक हवेली का ज़िक्र आता है, जो श्रद्धानंद बाबा का घर है और उपन्यास के नायक, शेखर का भी घर बनता है. प्रथमदृष्टया ‘निश्चय’ को एक सत्ता केंद्र कहा जा सकता है, उसमें मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि ‘निश्चय’ सत्ता केंद्र तो है लेकिन ‘निश्चय’ एक सकारात्मक सत्ता का केंद्र है और वह जो पुराने दौर की नीति थी, नैतिकता की जो सत्ता हो सकती है, जो ताकत हो सकती है; जो अच्छाई की ताकत हो सकती है, उसका केंद्र है. इस तरह एक प्रतीक बनता है नैतिक सत्ता का, जो जुड़ी है श्रद्धानंद बाबा के महारथी व्यक्तित्व से. जैसे ही श्रद्धानंद बाबा का निधन होता है, तो ढहने लगती है ये सत्ता. यह ‘अलेगोरिक’ भी है कि जब नैतिकता की सत्ता ढहने लगती है तो दूसरी सत्ता, एक मनुष्य विरोधी सत्ता किस तरह से ज्यादा पावरफुल होती है. आदर्श की सत्ता, जिसके तहत ‘नया आदमी’ नामक आन्दोलन का नेतृत्व बाबा निर्भय दास कर रहे थे, के समानांतर गृहमंत्री कमलेश पांडेय की सत्ता, एक अनैतिक सत्ता, एक मनुष्य विरोधी सत्ता कैसे ताकतवर बनती चली जा रही है—‘9 नवंबर’ इसे रिकॉर्ड करता है.
‘9 नवंबर’ का नायक विदेश से आया हुआ शेखर है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे कई बार प्रेमचंद के उपन्यास, ‘प्रेमाश्रम’ का ख्याल आया. ख्याल इस अर्थ में आया कि ‘प्रेमाश्रम’ का नायक भी विदेश से पढ़कर आता है और एक सपना देखता है; फिर अपने सपने को साकार करने के लिए ‘प्रेमाश्रम’ की स्थापना करता है. प्रेमचंद के ‘प्रेमाश्रम’ यानी बीसवीं सदी के दूसरे दशक से लेकर संजय चौबे के ‘9 नवंबर’ या इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक अर्थात सौ साल में हमारा भारतीय यथार्थ इतना नुकीला और तीक्ष्ण; इतना क्षरणशील हुआ है कि अब आदर्श के एक आश्रम की संभावना भी नष्ट हो चुकी है. वहाँ जहाँ एक प्रेमाश्रम सफल होता है, वहीं आज ‘नया आदमी’ का स्वप्न बिखर जाता है.
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