‘9 नवंबर’ : 'नया आदमी’ के स्वप्न से जुड़ा उपन्यास

चर्चित उपन्यास '9 नवंबर' के संबंध में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चंद्रेश्वर क्या कहते हैं, पढ़िए...

*********

          संजय चौबे अनुभव और दृष्टि संपन्न लेखक हैं. उनके पहले ही उपन्यास '9 नवंबर' को पढ़ते हुए आप पायेंगे कि वे सिर्फ़ लिखने के लिए ही नहीं लिखते हैं; बल्कि लेखन उनके लिए सामाजिक बदलाव से जुड़ा एक सशक्त माध्यम है. क़िताब उनके लिए हिंदी कवि ज्ञानेन्द्रपति के शब्दों में 'एक ख़तरनाक़ चीज़ है/ क़िताब की चुप्पी में बंद चीखें और ललकारें/ किताबों को खोलते ही/ बारूद की गंध की तरह उठने लगती हैं.’

          ‘9 नवंबर’ संजय चौबे की पहली औपन्यासिक कृति होते हुए भी शिल्प और भाषा के रचाव के धरातल पर एक क़िस्म की परिपक्वता का परिचय कराती है. इस पूरे उपन्यास की कथा का कालखण्ड उन्नीस सौ अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध का बिहार है--1986 से 1989 के बीच का. इस उपन्यास का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि इसका कथानक दो स्तरों या कहें तो दो समान्तर कथाओं को अपने में समाहित किये हुए है. एक स्तर या समान्तर कथा की पृष्ठभूमि अँधेरे पक्ष से जुडी है, तो दूसरे स्तर या समान्तर कथा की पृष्ठभूमि उजाले के पक्ष से जुडी है. इस उपन्यास के अँधेरे पक्ष में समाज की यथास्थितिवादी और सांप्रदायिक-जातिवादी शक्तियों की पहचान की गई है, तो उजाले के पक्ष में नई उभरती बदलावकारी शक्तियों को रेखांकित करने की जद्दोजहद भी दिखती है. यथास्थितिवादी शक्ति के प्रतीक पुरूष हैं, श्रद्धानन्द बाबू तो उनका बेटा शेखर नई बदलावकारी शक्ति या अग्निकण का प्रतीक है. संजय चौबे इस पूरे उपन्यास के माध्यम से ये बताना चाहते हैं कि किस तरह 9वें दशक का उत्तरार्द्ध न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे हिंदुस्तान में सांप्रदायिक-जातिवादी शक्तियों के उभार का है. 9 नवम्बर 1989 को सनातन भारत में राम जन्मभूमि का शिलान्यास हुआ था. उसी के आसपास बिहार के भागलपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए थे. वे दंगे इंसानियत को शर्मशार करने वाले थे. लाशों को दफनाकर उसके ऊपर गोभी के फूल लगा दिए गए थे. इस उपन्यास का नायक शेखर, जो एक कांग्रेसी नेता श्रद्धानन्द बाबा का विलायत में पढ़ा-लिखा बेटा है, नए समाज और नए आदमी की बात करता है. उसके मार्गदर्शक बाबा निर्भयदास हैं. उनका आश्रम बेतिया में है. 

दरअसल उपन्यासकार जिस दौर के सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल को लक्ष्य कर इस उपन्यास का ताना-बाना बुनता है, वो दौर सांप्रदायिक-जातिवादी और फासीवादी शक्तियों के उभार का है. नया समाज या नया आदमी बनाने का स्वप्न टूट-बिखर-सा जाता है ! उपन्यास के नायक या मुख्य पात्र का अवसान अँधेरे की शक्तियों की तथाकथित विजय गाथा को ही दर्शाता है. 

          उपन्यास का अंत मार्मिक आख्यान को प्रस्तुत करता है. ये उपन्यास जैसे बवंडर और आँधी के बीच किसी चीख की तरह हो ! इस चीख में ही शामिल है, नए समाज और नए आदमी के बनने का महास्वप्न ! इस महास्वप्न को बुद्ध, कबीर और कार्ल मार्क्स के साथ देश-दुनिया के अनगिनत हिस्सों के क्रान्तिकारियों ने देखा है. ये एक ऐसा महास्वप्न है जिसे संजय चौबे ने अपने इस उपन्यास के जरिये प्रस्तुत करना चाहा है. भले ही ‘नया आदमी’ बनाने का ये स्वप्न अधूरा रह गया हो; पर ये संघर्ष विराम नहीं ले सकता. इसी स्वप्न को अँधेरे की शक्तियां निगल लेना चाहती हैं. इस उपन्यास का नायक शेखर उस अग्नि पक्षी की तरह है जो मरकर भी बार- बार जीवित हो उठेगा ! 

 Important Links


There are some direct links to the websites important for current news Check our Latest news section also for being up to date with recent banking developments.

Download the Latest Newsletter