प्रथम उपन्यास

 

संजय चौबे देश की विविध समस्याओं के प्रति निरंतर चौकस रहने वाले रचनाकार हैं. उनके लेखन के पीछे राष्ट्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक विडंबनाओं से उपजी गहरी पीड़ा ही प्रेरणा बतौर काम करती है. देश की आजादी के दशकों बाद भी हमारे समाज की बहुजन आबादी और देश के कई हिस्सों के नागरिक अनेकशः परतंत्रता की स्थिति से जूझ रहे हैं. उन्हें व्यावहारिक तौर पर देश के स्वतंत्र और खुशहाल नागरिक की हैसियत नहीं प्राप्त हो सकी है. समाज को झूठी बहसों और मुद्दों में उलझाकर वंचित और प्रताड़ित आबादी की यथास्थिति को बनाये रखने हेतु जारी कुचक्र के ताने-बाने को संजय चौबे अपनी रचनाओं के माध्यम से उधेड़कर रख देते हैं.