हिंदी के मुक्कमल कवि हैं, ज्ञानेन्द्रपति. किताब पर उनकी एक बेमिसाल कविता है, 'टेलीविजन को देखो' जिसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.
फेंको पुस्तक
देखो अब शुरू होता है हमारा सबसे दिलचस्प कार्यक्रम
उसके बाद है फिर एक उससे भी दिलचस्प कार्यक्रम
पुस्तक को अब उठा नहीं पाओगे
बेहतर है उसे उठाकर अलग रख दो
शेल्फ पर टिका दो
उसमें फफूँद लगने दो
किताब एक खतरनाक चीज है
आदमी के हाथों में उसके जाते ही
सल्तनत के पाये डगमगाने लगते हैं
किताब की चुप्पी में बन्द चीखें और ललकारें
किताब को खोलते ही
बारूद की गन्ध की तरह उठने लगती हैं
रक्त संचार में घुलने लगती है
किताबों ने तोड़ा है सामंती ढाँचे को जहाँ तक बहुत ठीक
लेकिन अब खतरा हैं वे
उन्हें कैद करने की जरूरत
किताबों के लिए खोले हुए तो हैं आलमारियों की
धारियोंवाले पुस्तकालय
पुस्तकालयों के पेट में
आलमारियों के पटों में
बन्द रहने दो किताबों को
सजावटी चीजों की तरह
देखो तो कितनी खूबसूरत किताबें छपने लगी हैं यहाँ
महँगी हुई तो क्या
नयनाभिराम--तुम्हारी बौद्धिक संस्कृति की सुदर्शन पृष्ठभूमि
यदि कभी आँखें उचटें तो
दूर से निहारने के काबिल
दूर से सुनाई नहीं देती सिसकियाँ
आलमारी से उठती हुई
औचक सन्नाटे में
भले महसूस हो तुम्हें
एक घुटी हुई सिसकी अपने भीतर
कभी किसी दिन
तब देर हो चुकी होगी
तब देर हो रही होगी
अगला सीरियल शुरू होने में
तब तक भूल गए होंगे तुम्हें बचपन की लोरियों के शब्द
ये किताबों की बाँहें हैं
आदमी के इर्द-गिर्द
जिन्हें सबसे पहले तोड़ता है
पूँजीवाद का रंगीन बुलडोजर
किताबों की उजली पगडंडियों को मिटाता है
पूँजीवाद की राह बनाता यह रंगीन रोडरोलर
तुम्हारे स्मृतिपट को पथ बनाता है
तिजारती यातायात का
जिसके रंग-बिरंगे ट्रैफिक-संकेतों के गुप्त नियंत्रण-कक्ष में
जलता है
सब कुछ बेचने-खरीदने के युगबोध युगबोध का स्पिरिट-लैम्प
अपनी लौ पर हठी मन को काँच की नली की तरह मोड़ता हुआ