हिंदी के मुक्कमल कवि हैं, ज्ञानेन्द्रपति. झारखण्ड की ज़मीन से जुड़ी उनकी कई बेमिसाल कविताएँ हैं. उन्हीं में से एक कविता, "एक आदिवासी गाँव से गुजरती सड़क" को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.
एक आदिवासी गाँव
के बीच से गुजरती हुई सड़क
दोनों तरफ आदिवासी घरों की भित्तियाँ जिन पर रखवाली करती हथेली की छाप
गाड़ी की खिड़कियों के शीशों से एक कतार में रगड़ खाती हुई गुजरती हैं
कुतूहलवश आँखें बँधकर जिन्हें देखती हैं
स्मृति में अंकित करती हुई
ओरियानी के नीचे बेदी पर से
अलसाती-सी उठ रही स्त्री की आँखों से मिलती जाती आँखों की एक कतार
उत्सुकता की एक मुद्रा स्मृति में अंकित होती हुई
लाल मिट्टी की भीत के ऊपर छप्पर की जगह दिखती नीलिमा
भित्तियों के लाल रंग से आँजी हुई आँखें जिससे धुलती हैं
कि दिखता है
गड़हे में सूअरों के साथ खेल रहे नन्हे बच्चे
कीचड़ के रंग के बने हुए
सूअरों से अभिन्न
सभ्यता के इस तरफ सूअरों के साथ खेलने के लिए छोड़ दिए गए बच्चे
जिनके तन में केवल आँखें चमकती हैं
मानव-शिशु की आँखों की तरह
अहो ! कि जिनसे
मिलकर झुक जाती हैं आँखें
तब दिखता है
इस आदिवासी गाँव के आँगन से गुजरती हुई यह सड़क
अत्याचारियों के गुजरने का रास्ता है
यह इनके पैरों से नहीं बना
यह इनके पैरों के लिए नहीं बना
बड़े-बड़े रोड रोलर आए थे लुटेरे वाहनों के आने से पहले
धरती कँपाते धीरे-धीरे चलते हुए विशालकाय रोड रोलर
महावत की तरह जिन पर बैठा हुआ ड्राइवर
बीड़ी फूँकता
जुड़कर जिन्हें देखते थे बच्चे
रात जबकि जिनसे भारी साँसे छुटती थीं
टँगी हुई जलती थी बहुत मद्धिम ड्राइवर की लालटेन
एक-एक कर बीड़ियाँ बुझती थीं
पिघला अलकतरा पसर कर बनता था रात
फिर आए पीछे-पीछे
अगली सुबहों में
भारवाही वाहन
रिगें क्रेनें
चौड़े पंजर की ट्रकें ट्रेलर लगे ट्रैक्टर
बसें कारें हाकिम हुक्काम
आए तमाम
इस मिट्टी की छाती से
खनिज खँखोरने वाले तातारी लुटेरे
चमक पड़ा मर्म
आदिवासी गाँव की छाती से गुजरती सड़क का
कि हमारी शोषण की सभ्यता का
कि जिसकी बाँह राजधानी से
यहाँ तक यह आई है
लुटेरी बाँह
टटोलती इसकी छाती के कोयले आत्मा का अबरख
यह सड़क
कि यह नहीं राजधानी से बहती आई सभ्यता की नदी
कि इससे नहीं कोई सम्बन्ध
इसके किनारे बसे हुओं का
सिवा इसके कि
पिपासु पहियों के नीचे आ जाते हैं जब-तब
इनके चूजे और बच्चे
और अड़हुल-सा खिला किसी युवती का यौवन रौंदा जाता है
और ताड़ी से भरी लबनियाँ रीछ उतार लेते हैं
भुक्खड़ मानव-रीछ
इनके ताड़ के पेड़ों से
और ढक्-ढक् पी जाते हैं
सड़क का मर्म !
सड़क का समाजशास्त्र !
झारखंड के इस आदिवासी गाँव में यह जो
आती हुई सड़क है—
जाती हुई सड़क है
रात जिस पर चुप चींटियों की तरह कतार
बना कर
वे जा रहे हैं
ठीकेदार के कारिन्दे के पीछे
बँहगियाँ उठाए
पंजाब का देखने सूर्योदय
जहाँ सूर्य पूरी रोटी की तरह गोल
गेहूँ के खेतों के ऊपर