बेतरतीब पन्ने : हमारे समय की बड़ी समस्याओं का क्रिटिक रचता उपन्यास

प्रख्यात आलोचक एवं कवि नलिन रंजन सिंह के द्वारा संजय चौबे के उपन्यास 'बेतरतीब पन्ने' की समीक्षा...

          उपन्यासों को पढ़ते हुए बार-बार उपन्यास विधा के सवाल मन में आते हैं कि यह उपन्यास ही होना चाहिए था या उपन्यास है ही या उपन्यास बन सका कि नहीं और उपन्यास विधा में इसकी भूमिका कितनी रहेगी. इस कड़ी में संजय चौबे की कृति ‘बेतरतीब पन्ने’ को आलोचना की कसौटी पर कसने के बाद मैं कह सकता हूँ कि हाँ, यह उपन्यास ही है; उपन्यास बन पड़ा है और जब मैं बार-बार कहता हूँ कि लंबी कहानी से उपन्यास बनने का जो चलन शुरू हुआ है, ख़ास तौर पर 1990 के दशक के बाद, वह उपन्यास को बचाये रखेगा. आज उपन्यास विधा में चिंता घटते हुए समय के दबाव में लोगों की पठनीयता को लेकर है; समय की कमी के कारण दबाव बड़े उपन्यासों को न पढ़ पाने का है. ऐसे में सवा सौ या डेढ़ सौ या कि दो सौ पृष्ठों के अंदर के उपन्यास मुझे अच्छे लगते हैं. इसका एक कारण तो यह है कि उनको आप अपनी सुविधानुसार एक-दो बैठकी में पढ़कर खत्म कर सकते हैं; दूसरे, उपन्यास विधा को बचाये रखने में इस तरह के उपन्यास आगे मदद करने वाले हैं क्योंकि लोगों के पास समय लगातार घटता जा रहा है. कहानी की लोकप्रियता तो बनी रहेगी. साथ ही केवल प्रचार के बल पर बहुत चर्चा पाने वाले और बेस्ट सेलर घोषित हो जाने वाले ऐसे उपन्यास जिनमें रेत ही रेत हैं, पानी कुछ नहीं, वे नहीं चलेंगे; उपन्यास विधा का वे नुकसान करेंगे. ऐसे में ‘बेतरतीब पन्ने’ को पढते हुए मुझे अच्छा लगा क्योंकि इससे एक उम्मीद बंधती है.

          उपन्यास का शीर्षक ‘बेतरतीब पन्ने’ है, उसको संजय चौबे जो ध्वनित कर रहे हैं, शीर्षक से, वह उपन्यास को पढ़ते हुए भी लगता है. पहली बात यह कि उपन्यास सीधा शुरू नहीं होता. यह पूर्व दीप्ति शैली में है, फ्लैशबैक मै है. संजय चौबे उपन्यास की शुरुआत ‘क्रम से पूर्व’ से करते हैं; पीछे की बात आगे ले आते हैं और उसके बाद फिर क्रम से शुरू करते है. भाषा के स्तर पर यह उपन्यास की ताकत है कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं उपन्यासकार की समृद्ध भाषा का पता लगता है; ख़ासतौर से कश्मीर के प्रसंग में जब हम पहुँचते हैं तो पता लगता है कि उपन्यासकार के पास हिंदी और उर्दू दोनों की बहुत अच्छी भाषा है. उपन्यास के कथ्य पर आने से पहले, शिल्प के संबंध में एक और बात कि उपन्यास के गठन की प्रक्रिया में उपन्यासकार किसी घटना को लेकर के परिणति पर किस तरह पहुँचता है, यह बहुत महत्वपूर्ण होता है. ‘बेतरतीब पन्ने’ का लेखक इसे बहुत अच्छे तरीके से निभाता है, ख़ास तौर से जब आप भग्गू भंगी का प्रसंग पढ़ेंगे तो उसमें मक्खियों के भिनभिनाने का जो पूरा दृश्य है, वह बड़ा चाक्षुस बिंब बनाता है और उपन्यास में उस पूरे वातावरण को सृजित करने में सफल भी होता है. तो मेरे लिए यह उपन्यास इस मायने भी बहुत अच्छा लगा कि शिल्प के स्तर पर यह उपन्यास प्रभावित करता है; भले ही घटनाएँ क्रमवार न दिखें. 

          उपन्यास का नैरेटर, कथा वाचक, शेखर है; चाहता तो है कि उसका नाम शेखर सुमन रहे; लेकिन मिसिर मास्साब का जो हाइड्रा है, वह मानता नहीं है; वह बार-बार बन रहा है, टूट रहा है और इस पूरे उपन्यास में यहाँ तक कि आख़िर तक मिसिर मास्साब का हाइड्रा पीछा करता है. यह हाइड्रा जाति का है. जाति एक ऐसा दंश है, जो ओमप्रकाश वाल्मीकि जूठन में लिखते हैं. जाति का वह दंश सरनेम के साथ जुड़कर किस तरह से पीड़ा पहुँचाता है, वह इस उपन्यास में दिखाई देता है. दलित विमर्श में एक बहस है, बड़ी बहस है कि गैर-दलितों के द्वारा दलित संदर्भों पर लिखी गई रचनाओं को हम कहाँ रखें. दलित लेखन की सीमाओं को लेकर बार-बार सवाल उठता है और दलित लेखकों का यह मानना है कि दलितों के द्वारा दलितों के लिए दलितों ने जो कुछ भी लिखा है, वह दलित साहित्य है क्योंकि उन्हीं का अनुभव-जन्य है. मैं इस बात को बार-बार गंगाधर पानतावणे के बयान से ख़ारिज भी करता रहा हूँ. गंगाधर पानतावणे मराठी में ‘अस्मितादर्श’ पत्रिका निकालते थे. कहने की ज़रूरत नहीं कि वे एक बड़े संपादक और लेखक थे, दलित साहित्य के. गंगाधर पानतावणे ने कहा है कि एक तो जाणीव है संदर्भ; दूसरा सहजाणीव होता है. कभी-कभी जान करके, देख करके भी आदमी उस दर्द को पहचानता है और उसके लिए उन्होंने प्रेमचंद का उदाहरण दिया था, प्रसव के उदाहरण से. इसलिए जब आप जाणीव और सहजाणीव के सन्दर्भ में जायेंगे तब पता लगेगा कि प्रेमचंद का लिखा हुआ कितना कारगर है; वे क्यों सामंत के मुंशी नहीं हैं. क्यों दूधनाथ सिंह जब ‘निष्कासन’ जैसा उपन्यास लिखते है तो वह एक दलित छात्रा पर उच्च शिक्षा के संदर्भ में लिखा गया, 2002 में आया था वह, किसी भी लेखक के द्वारा लिखा गया अब तक का एकमात्र उपन्यास है. दलित छात्र पर तो लिखा गया है; ‘घुसपैठिये’ और ‘सुरंग’ जैसी कहानियाँ लिखी गयी हैं, जिन्हें दलित लेखकों ने ही लिखा है; लेकिन उच्च शिक्षा में किसी दलित छात्रा के संघर्ष को रेखांकित करता हुआ उपन्यास अभी तक नहीं लिखा गया, किसी दलित के द्वारा भी नहीं लिखा गया क्योकि मुझे कहने में कोई गुरेज नहीं कि अभी भी जो स्थिति मुख्यधारा के मंचों पर स्त्रियों की है उससे अच्छी स्थिति दलित मंचों पर भी दलित लेखिकाओं की नहीं है; वहाँ भी संकट है. इसलिए जब संजय चौबे इस उपन्यास को लिख रहे हैं तो मैं इसे अलग तरीके से, अलग ढंग से ज़रूर रेखांकित करना चाहूंगा और जोर देकर कहना चाहूंगा कि उनके उपन्यास में दलितों के बारे में जिस तरह से मुद्दा उठाया गया है और दलित विमर्श आया है, ख़ासतौर से अति दलित के बारे में, वह महत्वपूर्ण है. यहाँ मैं अति दलित जानबूझ कर कह रहा हूँ क्योंकि ओमप्रकाश वाल्मीकि की पीड़ा ‘शवयात्रा’ में हम पढ़ चुके हैं कि किस तरह से बल्हारों और चमारों के बीच का संघर्ष उसमें दिखाई देता है. तो संजय चौबे जिसको उठाते हैं, केंद्र में, वह शेखर चमार की पीड़ा तो है लेकिन किसके प्रति है ! उस भग्गू वाल्मीकि के प्रति है, जो मारा गया है और उसकी तुलना करते हैं सेना के एक जवान से जो सीमा पर मारा गया है और उसके बहाने वह मीडिया को और जो देशभक्त वाहिनी है उसको भी केंद्र में लेकर आते हैं कि मीडिया में किस तरह से एक रिपोर्टर कहता है कि ‘मौत हो तो ऐसी!!’; ‘मौत हो तो ऐसी’ में पिता भी मर रहा है शेखर का, भग्गू भी मर रहा है और उधर एक जवान शहीद हुआ है. तो मौत का भी जो केटेगराइज़ेशन है, जो वर्गीकरण है उसमें भी मिसिर मास्साब का जो हाइड्रा है, बार-बार पीछा कर रहा है. समाज में जाति का जो मामला है उसको संजय चौबे बार-बार प्रश्नांकित करते हैं और पाठक के सामने सवाल लेकर आते हैं. 

          इसी के साथ उपन्यास की एक बड़ी बात का ज़िक्र कि एक मत यह हो सकता है कि उपन्यास कहीं-कहीं अखबार जैसा लगता है. दरअसल जब उपन्यास में उपन्यासकार नैरेटर के माध्यम से अपने कहन को लाऊड करता है तो कभी-कभी उन घटनाओं के ब्योरे में ये सब चीज़ें आ भी जाती हैं क्योंकि तारीख़ों का उल्लेख है कि अमुक तिथि को अमुक घटना घटित हुई. ऐसे में कथा कुछ-कुछ रिपोर्ताज़ के क़रीब जायेगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता; लेकिन उस घटना की जीवंतता के लिए, जैसे कि एक दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत किया गया हो, कहीं-कहीं यह ज़रूरी भी हो जाता है, अन्यथा पाठक को लग सकता है कि बात केवल हवा-हवाई है और लेखक के अपने मन की, सिर्फ कल्पना के आधार पर गढ़ी गई चीज़ है; उसकी सच्चाई को कायम रखने के लिए लेखक इस तरह की चीज़ों को बुनता है और वह ज़रूरी भी है. गौरतलब है कि कश्मीर के जो दोनों प्रसंग इस उपन्यास में उठाये गए हैं, हो सकता है कि उन ब्योरों के बिना वे थोड़े-से छिछले हो जाते, कमजोर हो जाते; लेकिन उन ब्योरों से उनकी जीवंतता, उनका सातत्य, उनकी प्रासंगिकता आज के पूरे संदर्भ में समग्रता से आती है. एक और बात यह भी कि सेना को लेकर बार-बार यह कोशिश रहती है कि उस पर सवाल नहीं किया जा सकता; सेना को एक ‘होली काऊ’ बनाते हुए एक पवित्र भाव देने की कोशिश निरंतर जारी रहती है, उसको इतने बढ़िया तरीके से डिकोड करते हुए, इतने बेहतर तरीके से उपन्यास में प्रश्नांकित किया गया है कि उसके लिए अलग से उपन्यासकार को बधाई बनती है और सच तो यह है कि वही प्रसंग इस उपन्यास में बड़ा प्रसंग बन कर के आता है.

          संजय चौबे हमारा ध्यान और भी कई बातों के साथ एकध्रुवीय पूंजीवादी दुनिया की तरफ़ भी ले जाते हैं और उपन्यास की टिप्पणी है कि ‘पूरी दुनिया घंटा बजाएगी और वे राज करेंगे’; और इसमें आम आदमी ही घंटा है, जो बजाये जाने के लिये पैदा हुआ है. इस तरह संजय चौबे जो प्रतीक भी गढ़ते हैं, वह अनोखा है; जैसे कि भीड़-भारत. अचानक भीड़ ने न्याय को अपने हाथ में ले लिया है और भीड़ तय करने लगी है--जिसको चाहो मार दो, जिसको चाहो देशद्रोही कह दो और जिसको चाहो देशभक्त घोषित कर दो. यह जो नए तरह के मेटाफर रचे जाने का समय है, उसमें संजय चौबे ने एक शब्द दिया है, भीड़-भारत. भीड़-भारत के साथ इन्होंने एक और प्रतीक दिया है, कुरुक्षेत्र का. और कुरुक्षेत्र हो कहाँ रहा है--व्हाट्सएप पर, फेसबुक पर और ट्विटर पर. इन जगहों पर कुरुक्षेत्र छिड़ा हुआ है और सोशल मीडिया की क्या भूमिका है, आज के दौर में, इसको भी बहुत क़ायदे से संजय चौबे ने अपने उपन्यास में उठाया है.

          आस्थाओं पर सवाल करना, यह आज बड़ा जोखिम भरा है; लेकिन संजय चौबे की यह किताब ऐसा करती है. वे लिखते हैं- ‘आस्थाओं पर सवाल से भक्तों का व्यथित होना समझ में आता है, फिर भी आस्थाओं के नाम पर सड़ती व्यवस्था को बदलने के लिए सवाल तो करना ही पड़ता है.’ आज जब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए लोगों को बार-बार सोचना पड़ रहा है, आस्था के नाम पर तर्क को नकारा जा रहा है; तब आस्थाओं पर सवाल उठाने की बात करना एक बड़ी बात है. आगे वे लिखते हैं कि ‘आवश्यक है कि असाधारण शक्तियों वाले पीरों से सवाल-जवाब होते रहें, अन्यथा बेबस ज़िंदगियाँ सिसकती रहेंगी और हम पीरों की मज़ार पर चादर चढ़ाते रहेंगे.’ तो इस पूरे परिदृश्य में जो आस्था और तर्क के बीच के बहस को भी संजय चौबे उपन्यास के केंद्र में ले करके आते हैं. एक सच्चाई है यह और उसका खामियाजा हम भुगत रहे हैं, इसलिए कि वैचारिक रूप से जो आधुनिकता हममें आनी चाहिए थी, वह नहीं आई और आधुनिक बहुत सारी चीज़ें हम को थमा दी गईं. मसलन, मोबाइल जैसे गैजेट को लें. आधुनिक गैजेट एक दूसरे तरह से हमारे दिमाग को प्रभावित कर रहे हैं और निहित स्वार्थ के तहत हमें दिमागी तौर पर गुलाम बनाये रखने की पूरी प्रक्रिया जारी है. सस्ते इंटरनेट के माध्यम से जो व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी स्थापित हुई और उसने जो ज्ञान बाँटा, उसने तर्क की परंपरा को और कुंद किया. तो ऐसी स्थिति में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि हम, जो आधुनिक परिप्रेक्ष्य है उसमें भी, अपनी जो तर्क की परंपरा है, सवाल की परंपरा है, उसको न छोड़ें. नागसेन, मिलिंदपन्हो की परंपरा हम सब जानते हैं, इसी देश की परम्परा रही है. अगर मिलिंदपन्हो की परंपरा को आज दबाया जा रहा है तो स्वाभाविक है कि ऐसे मौसम में इस तरह की बातें लिखने वाले उपन्यासकार की जो बातें हैं, उनको ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए. ‘आख़िरी कलाम’ दूधनाथ सिंह का उपन्यास है. उसकी एक पंक्ति है कि ‘किताबें शक पैदा करती हैं.’ किताबें इसलिए शक पैदा करती हैं कि जब आप पढ़ते हैं तो जो हूबहू कहा जा रहा है, उस पर विश्वास नहीं करते और बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी देन हमारे लिए यही है कि उसने हमको प्रश्न करना सिखाया और प्रश्न करने से पहले हमको संदेह करना सिखाया. हम अगर संदेह करते हैं, तो प्रश्न करते हैं और प्रश्न करते हैं, तो जवाब ढूँढने की कोशिश करते हैं. और संजय चौबे के इस उपन्यास में जो जवाब मिलता है, वह चौंकाने वाला है. इस उपन्यास में दलित विमर्श और धर्म के विमर्श के साथ-साथ स्त्री विमर्श के भी टूल्स हैं. विवाहेतर संबंधों का एक संदर्भ आता है और अंत में होता यह है कि सेना का एक अधिकारी अपने पूरे कार्यकाल में तो अकेले घूमता है, पत्नी को साथ नहीं रख रहा है. बड़ा भारी नाम है उसका, लेकिन अंत में जब वह सेटल हो जाता है तो चाहता है कि पत्नी तलाक का मामला वापस ले ले और आकर उसके साथ रहे और साथ नहीं रहने की स्थिति में वह कश्मीर के अपने कार्यकाल के दरम्यान जो जब्ती की गई थी, उसमें से पाकिस्तान में बने हुए एक हैंड ग्रेनेड को पार्सल बम के रूप में इस्तेमाल करता है और महिला के साथ रहने वाले अली की हत्या करता है. उस पर भी किस तरह की टिप्पणियाँ हैं कि सिर्फ अली नाम होने से, मुस्लिम होने से किस तरह से पूरी बात ही बदल जाती है--मीडिया की धारा, भक्तों की धारा, सबकी कि मृतक देशद्रोही है और उस स्त्री के लिए कितनी गालियाँ निकल कर आती हैं. तो सिर्फ कश्मीरी पंडितों के ही सवाल नहीं हैं, सेना के द्वारा जो ब्रूटिलिटी है, जो क्रूरता है, उसको भी इस उपन्यास में ब-ख़ूबी दर्शाया गया है. 

          इस तरह, वास्तविकता क्या है और उसको आम आदमी के समक्ष प्रस्तुत कैसे किया जाता है--इन दोनों के बीच का जो फ़र्क़ है, उसको बहुत क़ायदे से संजय चौबे का यह उपन्यास डिकोड करता है और हमारे समय की बड़ी समस्याओं का एक क्रिटिक रचता है. 

(2019)

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