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आज के चुनौती भरे समय में अभिव्यक्ति के समक्ष बहुत बड़े-बड़े खतरे मौजूद हैं. हालात यहाँ तक पहुँच चुका है कि तमिल के एक उपन्यासकार को अपनी लेखनी की मौत का ऐलान करना पड़ रहा है; तो इस कठिन समय में उन चुनौतियों से रूबरू होते हुए अगर कोई लेखक अपने समय से नज़र मिलाते हुए कोई कृति लेकर आता है तो वह निश्चितरूपेण साहित्य की हमारी दुनिया को समृद्ध करता है. आज के जो हालात हैं, उसकी पृष्ठभूमि क्या है ? आज राजनीति जहाँ पहुँची हैं, उसकी जड़ें कहाँ पर हैं ? संजय चौबे अपने उपन्यास ‘9 नवंबर’ में उन जड़ों तक पहुँचते हैं और विशेष रूप से उल्लिखित करते हैं कि ‘9 नवंबर’ से आशय बर्लिन की दीवार के गिरने और राम जन्मभूमि के शिलान्यास से है.
बर्लिन की दीवार गिरी; भारतीय समाज में मंदिर-मस्जिद को लेकर एक बड़ी हलचल थी. नई आर्थिक नीतियों--उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण; का आहट साफ़ सुनाई दे रहा था. संजय चौबे इन सबके लगभग तीन वर्ष पूर्व का समय लेते हैं यानी कि उपन्यास के काल का प्रारंभ फरवरी 1986 से होता है, जब राम जन्मभूमि के नाम पर बाबरी मस्जिद का ताला खुला और 1989 के 9 नवंबर तक चलता है. समाज में कोई राजनीतिक घटनाक्रम होता है तो उस राजनीतिक घटनाक्रम के साथ समाज की स्थितियाँ क्या हैं यानी कि समाज कहाँ पर खड़ा हुआ है; समाज का एक व्यक्ति उन घटनाओं के प्रति अपनी अंत:प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त कर रहा है; इस तरह व्यक्ति, घर-परिवार और समाज के बीच राजनीति की जो आवाजाही है, वह बहुत ही बेहतर ढंग से इस उपन्यास में मौजूद है. प्रतिरोध के रूप में संजय चौबे जिन चीज़ों को चिन्हित करते हैं उसे रेखांकित करने की ज़रूरत है—हमारे समय-समाज व राजनीति में धर्म की जो भूमिका है, जाति की जो भूमिका है और धर्म व जाति की भूमिका ने इस देश की राजनीति को, इस देश की संस्कृति को जिस तरह से मथा है, जिस तरह से आंदोलित किया है, जिस तरह से विकृत किया है; ज़ाहिर है कि एक संवेदनशील उपन्यासकार की चिंता का वह विषय बनता है और बनना चाहिए. संजय चौबे इन्हीं चिंताओं को अपने उपन्यास में दर्ज करते हैं.
शेखर इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है. हिंदी उपन्यास में ‘शेखर’ एक बहुत बड़ा नाम है. अज्ञेय ने लिखा था—‘शेखर : एक जीवनी’; लेकिन ‘शेखर : एक जीवनी’ का जो संदर्भ है, वह एक भिन्न संदर्भ है, वह एक धीरोदात्त नायक था. संजय चौबे का ‘शेखर’ उस ‘शेखर’ को तोड़ता है; यह ‘शेखर’ उस ‘शेखर’ की ज़मीन पर नहीं खड़ा है. साथ ही साथ इस उपन्यासकार की एक विशेषता को मैं रेखांकित करना चाहूंगा, यह उपन्यास लिखते हुए लेखक ने अपने वर्ग और वर्ण का अतिक्रमण किया है यानी कि संजय चौबे ने डि-क्लास और डि-कास्ट होकर इस उपन्यास को लिखा है. इस तरह से यह बड़ी बात है. मेरी एक चिंता का यह विषय रहा है कि आज के समय में साहित्य समाज के बहुत से लोग, बड़े-बड़े नाम एक बार फिर वापस हो रहे हैं अपनी जाति और अपने वर्ण में. वे या तो सीधे-सीधे अपनी जाति का ‘इओलौज़िआ’ या फिर प्रक्षन्न रूप में इसके पक्ष में लिख रहे हैं. हिंदी साहित्य के मुख्यधारा की एक परंपरा रही है--प्रेमचंद, बाबा नागार्जुन, राहुल सांकृत्यायन से लेकर बाद के लेखकों तक लंबी परंपरा रही है, वर्ग और वर्ण से मुक्त होकर वंचित वर्ग के सरोकार से जुड़कर लेखन करना. आज एक बड़ी संख्या ऐसी है जो उस प्रतिबद्धता से विलग होती सी दिखती है. तो संजय चौबे के द्वारा अपने पहले ही उपन्यास में वर्ण एवं वर्ग से मुक्त होकर आत्मालोचना की ज़मीन पर खड़े होकर लेखन करना हिंदी की पुरानी परंपरा को जीवित करना है.
उपन्यास में ‘निश्चय’ नाम की हवेली का ज़िक्र आता है. ‘निश्चय’, सत्ता का केंद्र है और जो ‘पावर स्ट्रक्चर’ है उसके मुताबिक़ उस सत्ता के केंद्र में मंत्री हैं, उद्योगपति भी हैं, पत्रकार हैं यानी कि समाज की नकेल जिन लोगों के हाथों में है, ‘निश्चय’ उसका प्रतीक है. ‘निश्चय’ उच्च वर्ण का है, उच्च वर्ग का भी है और इस तरह वह समूची राजनीति को संचालित करता है. इस तरह ‘निश्चय’ के माध्यम से उपन्यास राजनीति की बारीक परतें खोलता है.
समाज में सांप्रदायिकता किस तरह से पनपी है, किसी भी छोटी अथवा मासूम घटना को कैसे बड़ी आसानी से सांप्रदायिक रूप दिया जा सकता है, उस फेनोमेना को समझने के लिए छोटी-छोटी घटनाएँ उपन्यास में आती हैं. गाँव का एक व्यक्ति है, जो लंबी चुटिया रखता है और जो कभी भी, कहीं भी खर्राटे मारते हुए बड़ी गहरी नींद सो जाता है. एक दिन जब वह गहरी-नींद में होता है, कुछ बच्चे खेल-खेल में उसकी चुटिया काट लेते हैं. एक सांप्रदायिक समय में यह छोटी सी घटना गाँव के शांत जीवन में आग लगा देती है. वाह्य वातावरण जब सांप्रदायिक होता है तो सांप्रदायिकता किस तरह से समाज, घर और गाँव के जीवन में पैठ बना लेती है, इस छोटी सी घटना से साफ़ हो जाता है. सांप्रदायिकता के साथ समाज जिससे झुलस रहा है, वह जातिवाद है, जातिगत अहंकार है. प्रेमचंद ने बहुत पहले ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी कहानी लिखी थी, लेकिन आज के हालात क्या हैं. उपन्यास की निगाह वहाँ जाती है कि अभी भी ऐसा कुआँ शेष है जिससे दलित पानी नहीं निकाल सकता और इसको लेकर स्थिति यहाँ तक खराब होती है कि दलितों की हत्या होती है. इस तरह उपन्यास में सांप्रदायिकता की विभीषिका है, जाति की विभीषिका है और ये किस तरह से राजनीति को विकृत रूप दे देती हैं— ‘9 नवंबर’ का लेखक उसे पकड़ता है.
इन विभीषकाओं से जूझते समाज के लिए समाधान क्या है, विकल्प क्या है. यहाँ गौर करने वाली बात है कि एक उपन्यास कोई ‘सोशियोलॉजिकल डॉक्यूमेंट’ नहीं होता कि हर तरह की समस्याओं--आर्थिक, सामजिक, राजनीतिक, सारी समस्याओं को, उनकी सारी जटिलताओं को समझते हुए शत प्रतिशत, शुद्ध-सही हल पेश करे; यह उपन्यास का काम नहीं होता; लेकिन उपन्यासकार का काम यह ज़रूर होता है कि वह एक वैकल्पिक विज़न दे, एक वैकल्पिक दृष्टि पेश करे. तो मैं संजय चौबे के इस उपन्यास को वैकल्पिक दृष्टि का उपन्यास कहता हूँ. इसमें वैकल्पिक विज़न क्या है ? वैकल्पिक विज़न शेखर के माध्यम से है जो ‘न्यू मैन’, ‘नए आदमी’ का आंदोलन चलाता है. ‘न्यू मैन’, ‘नए आदमी’ की अवधारणा के रूप में उपन्यास ने एक प्रतिपक्ष पेश किया है या कि अपना पक्ष पेश किया है, एक विकल्प पेश किया है. यह सच्चाई है कि हम सबके घर-परिवार में व्यक्ति के लेवल पर, व्यक्तिगत स्तर पर अंतरजातीय विवाह होने लगे हैं, स्वीकृत होने लगे हैं; लेकिन जाति और धर्म को लेकर हमारी मूढ़ता, हमारा दुराग्रह जिस तरह से वास्तविक जीवन को विषाक्त कर रहा है, उपन्यास अन्तरजातीय/अंतरधार्मिक विवाह को एक आंदोलन के रूप में चलाने का विकल्प प्रस्तावित करता है. उपन्यास का विज़न है कि अगर अंतरजातीय विवाह हो—ब्राहमण-दलित या कि क्षत्रिय-वैश्य, हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई, पारसी सबके बीच, आपस में वैवाहिक संबंध हो; अर्थात एक ही परिवार में हिन्दू हों, मुस्लिम हों; दलित हों, ब्राहमण हो, ईसाई हों, क्षत्रिय हों तो समाज का एक अलग ही स्वरूप होगा. उपन्यास एक और बात को रेखांकित करता है और जोर देकर कहता है, सड़ी-गली पुरातन चीज़ों से हम इतना प्रेम या कि अतिरिक्त प्रेम करते हैं कि हमें तमाम सड़न दिखता ही नहीं तो आवश्यक है सड़-गल चुकी आस्थाओं-मान्यताओं से इस अतिरिक्त प्रेम को त्यागना.
कुल मिलाकर उपन्यास वंचितों-पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होता है. इसमें बाढ़ का एक ज़िक्र आता है. बाढ़ आती है, उस बाढ़ में कौन बहता है, कौन बेघर होता है ? ज़ाहिर है कि हाशिए का जो समाज है, जो गरीब हैं, जो निर्धन हैं, जिनके कच्चे मकान हैं, जो झोपड़ियों में रहते हैं—वे सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाते हैं; उनका घर-बार नष्ट होता है, बाढ़ में बह जाता है. बहने वाला दलित जाति का होता है, वह अल्पसंख्यक होता है, छोटे कामों को करने वाला होता है. साफ़ है कि लेखक की निगाह इन सब पर है, उसकी सहानुभूति इन वर्गों के साथ है.
एक बात और, यह उपन्यास एक विकल्प के रूप में नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लिखा हुआ उपन्यास इन अर्थों में है कि एक सामाजिक नज़रिये के साथ, आज की राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं से जुड़कर एक लोकप्रिय कलेवर में जिस तरह से इसकी प्रस्तुति है, उसे मैं हिंदी में एक नए तरह का, एक नई शुरुआत मानता हूँ. आज की नई पीढ़ी जिस तरह के साहित्य का भक्षण कर रही है और जिसे वह साहित्य समझ रही है, वास्तव में वह साहित्य है कि नहीं—इस संबंध में बग़ैर कुछ कहे सब साफ़ है. ऐसे में युवा पीढ़ी की ज़रूरत को पूरा करते हुए एक गंभीर नज़रिये से लिखा हुआ यह उपन्यास है जो अपने कंटेंट, विषय-वस्तु को लेकर बेहद गंभीर है. साथ ही इतना रोचक है कि हमेशा जिज्ञासा बनाए रखता है. विषय-वस्तु की गंभीरता इसे बोझिल नहीं बनाती; बेहतरीन ढंग से की गई प्रस्तुति इसे बेहद पठनीय बनाती है.
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