ज्ञानेन्द्रपति Gyanendrapati

मानव की चेतना यात्रा में सदियों से हमारे साथ एक दुर्घटना होती आयी है। यह दुर्घटना है - हमारा किसी विचारधारा विशेष के समर्थक के रूप में उभरना. हमें पता भी नहीं होता और हम ‘विचारधारा’ के किसी खेमें में शामिल हो अनायास ही असहिष्णुता और आतंक का खेल खेलने लगते हैं।  पक्ष और विपक्ष की यह लड़ाई जब सभ्यता के हर क्षेत्र - साहित्य, कला, संगीत में गहरे तक जड़ फैला चुकी हो, एक “ज्ञानेन्द्रपति” का यह दावा कि उसका पक्ष उसके पाठकों के पक्ष में विलीन हो चुका है तो निस्संदेह वह “ज्ञानेन्द्रपति” एकाकी रह जाता है। लगभग दसेक वर्षों तक बिहार सरकार में अधिकारी के रूप में कार्य करने के बाद कविता के मोहपाश में फंसे ज्ञानेन्द्रपति सब कुछ त्याग कविता के संग गंगातट - बनारस में बसे, तो कविता विविध रूप में प्रकट हुई.

जीवन-वृत्त

जन्म : 1 जनवरी 1950 को ग्राम पथरगामा, झारखंड, भारत

दसेक वर्षों तक बिहार सरकार से अधिकारी ।

सम्प्रति : कूलवक्ती कवि ।

प्रकाशित कृतियाँ

कविता संग्रह

1.  आँख हाथ बनते हुए (1970)

2.  शब्द लिखने के लिए ही यह कागज़ बना है (1981)

3.  गंगातट (2000) किताबघर प्रकाशन

4.  संशयात्मा (2004) किताबघर प्रकाशन

5.  भिनसार (2006)

6.  कवि ने कहा (कविता संचयन) किताबघर प्रकाशन

7.  मनु को बनती मनई (2013) 

8. गंगा-बीती

9. कविता-भविता

अन्य

कथेतर गद्य : पढ़ते-गढ़ते

काव्य-नाटक : एकचक्रानगरी

पुरस्कार व सम्मान

वर्ष 2006 में ‘ संशयात्‍मा’ शीर्षक कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा पहल सम्‍मान, बनारसीप्रसाद भोजपुरी सम्‍मान व शमशेर सम्‍मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार  से विभूषित।